भारत में इंजीनियरिंग शिक्षा के मुख्य issues - NIT, IIT पाठ्यक्रम की सच्चाई | Engineering Problems in India I[BharatShikshaHub]

भारत में इंजीनियरिंग शिक्षा: पाठ्यक्रम और व्यवहारिक शिक्षा के बीच की खाई.


A split image: On the left, a student coding in a modern computer lab. On the right, a student copying from a notebook with faulty equipment in an outdated engineering lab. Depicting the paradox of engineering education in India.



भारत में इंजीनियरिंग की डिग्री को सफलता की एक सुनहरी चाबी माना जाता है, खासकर आईआईटी और एनआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से। परन्तु, जमीनी हकीकत अक्सर इस धारणा से बिल्कुल अलग होती है। एक प्रतिष्ठित एनआईटी, जैसे कि एनआईटी पटना, के कंप्यूटर विज्ञान से जुड़े एक छात्र के नज़रिए से देखें तो चिंताजनक समस्याएं स्पष्ट होती हैं।

सबसे बड़ी समस्या है पाठ्यक्रम का असंगत और अप्रासंगिक होना। पहले वर्ष में, चाहे आपकी ब्रांच कंप्यूटर साइंस ही क्यों न हो, आपको भौतिकी, रसायन विज्ञान और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग जैसे विषय पढ़ने होते हैं। इसका सीधा असर यह होता है कि अपने मुख्य क्षेत्र, जैसे प्रोग्रामिंग, पर ध्यान केंद्रित करने का समय ही नहीं मिल पाता। एक साल बाद भी, कंप्यूटर से जुड़ा ज्ञान सिर्फ 'C' भाषा की बुनियादी बातों तक ही सीमित रह जाता है क्योंकि पूरा पाठ्यक्रम पूरा कर पाना ही एक चुनौती बन जाता है। चार साल के कोर्स में लगभग आधे विषय ऐसे होते हैं जिनका सीधा संबंध हमारे चुने हुए क्षेत्र से नहीं होता, और इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि पाठ्यक्रम बनाने वाले विद्वान थे।

शिक्षण की गुणवत्ता भी एक गंभीर चिंता का विषय है। कुछ प्रोफेसर एक पूरी कक्षा में केवल एक साधारण KVL या KCL का प्रश्न हल करने में व्यतीत कर देते हैं, और अक्सर ऐसा भी होता है कि वे स्वयं उस प्रश्न को गलत कर देते हैं या फिर इसे छात्रों के लिए अंत में छोड़ देते हैं। इससे छात्रों का कीमती समय बर्बाद होता है और अवधारणाएं स्पष्ट नहीं हो पातीं।

प्रयोगशालाओं (लैब) की स्थिति और भी ख़राब है। ज़्यादातर उपकरण ठीक से काम नहीं करते हैं, जिसके कारण छात्रों को अपने साथियों की नोटबुक से डेटा नकल करना पड़ता है। यह स्थिति व्यावहारिक शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही पराजित कर देती है। आईटी लैब में, 21वीं सदी में भी, छात्रों से कंप्यूटर पर 10-12 प्रोग्राम लिखने और फिर उन्हीं को कागज़ पर स्याही से लिखने को कहा जाता है, जो कि एक पुरातन और समय की बर्बादी वाली प्रक्रिया है।

इसके अलावा, 75% उपस्थिति का अनिवार्य नियम छात्रों को कक्षाओं में बाँधे रखता है, भले ही शिक्षण का स्तर उच्च न हो। परीक्षा प्रणाली रटंत विद्या को बढ़ावा देती है। प्रश्नपत्र अक्सर प्रोफेसरों के नोट्स से ही तैयार किए जाते हैं, और जो छात्र उन नोट्स को सबसे अच्छी तरह से याद कर लेता है, वही टॉपर बनता है। एक बार एक परीक्षा में प्रश्न में ही एक डेटा गायब था, लेकिन आधे छात्रों ने स्वतः ही वोल्टेज का मान 10V मान लिया क्योंकि वे नोट्स से उसे याद करके आए थे। यह घटना इस बात की पुष्टि करती है कि समझने के बजाय याद रखने पर कितना ज़ोर दिया जाता है।

निष्कर्षतः, भारत में इंजीनियरिंग शिक्षा एक गहरे सुधार की मांग करती है। पाठ्यक्रम को अद्यतन और केंद्रित करने, शिक्षण विधियों में सुधार लाने, प्रयोगशालाओं के बुनियादी ढाँचे को मज़बूत करने और रटंत प्रणाली के स्थान पर अवधारणात्मक समझ पर ज़ोर देने की सख्त ज़रूरत है। तभी हमारे इंजीनियरिंग संस्थान वास्तव में विश्व स्तरीय बन पाएंगे और देश को सही मायनों में सक्षम इंजीनियर प्रदान कर पाएंगे।

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